परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी संकल्प की अपार शक्ति (गतांक से आगे)

विगत अंक में आपने पढ़ा कि परमवन्दनीया माताजी अपने इस हृदयस्पर्शी उद्बोधन में समस्त श्रोताओं को संकल्प की अपार शक्ति से परिचित कराते हुए कहती हैं कि संकल्प में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। वे परमपूज्य गुरुदेव का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गायत्री परिजनों को स्मरण दिलाती हैं कि परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन में साधना के जिस हिमशिखर को स्पर्श किया, उसका मूल आधार अटूट संकल्प ही था। गायत्री जयन्ती के पावन अवसर पर दिया गया उनका यह उद्बोधन हर गायत्री-उपासक को यह भी याद दिलाता है कि सही अर्थों में गायत्री मंत्र का उद्देश्य भी संकल्प का जागरण ही है। वन्दनीया माताजी माँ गायत्री और माँ गंगा को एक बताते हुए कहती हैं कि माँ गंगा का अवतरण भी संकल्प का ही परिणाम है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ........

करुणा का स्रोत—अखण्ड ज्योति

बेटे, आपके सिर पर गायत्री माता तब तक सवार नहीं हो सकती, जब तक आप भगीरथ जैसा संकल्प नहीं करेंगे। जैसे युग के भगीरथ ने संकल्प लिया है और गायत्री माता बेटे उनके हृदय में विराजमान हैं और जिसके हृदय से करुणा का स्रोत फूटता है। आप जरा अखण्ड ज्योति को तो पढ़िए।

वो क्या है? करुणा का स्रोत है। जो करुणा सुबह के समय फूटती है, बस, उसमें जो अन्तःकरण से नहा लेता है, वो पा लेता है और धन्य हो जाता है और जो अन्तःकरण से नहीं नहाया, वो प्यासा ही रह गया।

यहाँ एक सज्जन आए और कहने लगे कि माताजी! हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति आती है, कई साल से आती है। अच्छा बेटा, आती है तो बहुत अच्छी बात है। फिर वह अपने आप बोल पड़े कि माताजी! आती तो है, पर मैं आपके सामने झूठ नहीं बोलूँगा। लखनऊ का था। 25 साल पहले 20 रुपये थे अब 25 रुपये हो गए। मैं पढ़ता नहीं हूँ। तो मैंने कहा कि बेटा हमें तेरे 25 रुपये नहीं चाहिए, तू किसी गरीब को दे देना, उसका उद्धार हो जाएगा।

पढ़ना है तो मँगाओ, नहीं पढ़ना है तो मत मँगाओ। इसको पढ़ेगा तो इससे तेरे दाम्पत्य जीवन से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक, कौटुम्बिक हो या सामाजिक अथवा राष्ट्रीय जो समस्याएँ हैं, वो सुलझती हुईं चली जाएँगी। पढ़ तो सही।

ज्ञान की गंगा में नहाएँ

अरे! अभागे पढ़ता तो है नहीं, अन्तःकरण में जाता नहीं है, ज्ञान की गंगा में नहाता तो है नहीं, फिर कैसे तेरे पाप कटेंगे? तेरा पाप नहीं कटेगा। न इस जीवन में कटे न अगले जन्म में, तू तो ऐसा-का-ऐसा ही रहेगा। यह शब्द नहीं कहना था, पर मैं आपके सामने जब आ ही गई हूँ तो मन खोल करके क्यों न कह देना चाहिए।

मन खोल करके मैं आपसे निवेदन कर रही हूँ कि इस गंगा में आप भावविभोर होकर के गोते लगाएँ। भावविभोर होकर के गोते लगाएँगे तो आपको अनेक मणि-माणिक्य मिलते हुए चले जाएँगे। ऐसी दौलत मिलती चली जाएगी, जिसका नाम हीरा है, पुखराज है, पन्ना है और जाने क्या-क्या है? वो अपार दौलत—अपार सम्पदा आपको मिलती हुई चली जाएगी।

मैंने निवेदन किया है कि गोता लगाएँगे तो पाएँगे, गोता नहीं लगाएँगे, किनारे पर ही बैठे रहेंगे तो बैठे रहिए आप गंगा के किनारे, प्यासे-के-प्यासे रहेंगे। ‘‘जल बिन मीन प्यासी रे, मोहि सुन-सुन आए हासी रे।’’ सुन-सुनकर हमें हँसी आती है कि गंगा के किनारे बैठे रहे और कुछ पाया भी नहीं। प्यासे-के-प्यासे ही रह गए, उस महासत्ता से भी जुड़े रहे और अज्ञान के अँधेरे में भी पड़े रहे। अरे इससे ज्यादा और क्या विडम्बना हो सकती है।

जीवन में परिवर्तन लाएँ

यह विडम्बना है कि जिससे हम जुड़े हैं, उसका हम अनुकरण नहीं कर सके। उसको अपने जीवन में हम उतार नहीं सके, हम प्रलोभन में ही पड़े रहे। हम मोह, माया की जंजीरों में ही जकड़े रहे। तो उससे जुड़ने से क्या लाभ हुआ? फिर तो ये भीड़ इकट्ठी हो गई। चलो सोमवती अमावस्या का मेला है। चलो गंगा जी नहाएँगे, चलो गायत्री जयन्ती मनाएँगे।

हम भी चल रहे हैं, आप भी चलिए। अच्छा बेटा चलो बहुत अच्छी बात है, पर गायत्री जयन्ती का अर्थ भी आपने समझा क्या? गायत्री माता को अपने अन्तःकरण में भी उतारा क्या और जिससे आप जुड़े हैं, उसका अनुकरण भी क्या किया आपने?

अपने जीवन में कोई परिवर्तन भी लाए क्या? नहीं? सो तो हम नहीं लाए, जैसे-के-तैसे हैं। जैसे थे वैसे हैं, तो फिर आप कैसे शिष्य बन गए? कैसे गुरुजी से जुड़ गए? और कैसे माताजी के बेटे हो गए और कैसे गायत्री माता के साधक हो गए, जरा बताना तो सही। आप तो कुछ भी नहीं हो गए, जो कुछ आप कहते हैं, वही हो गए।

संकल्प लीजिए कि हम जहाँ जुड़े हैं, उनका हमको अनुकरण करना है। अपने जीवन में अनुकरण करना है और आगे हमको उसका विस्तार करना है।

बेटे, अनुकरण तो किया आपने कि एक कोने में जाकर बैठ गए। माताजी हम तो अनुकरण कर रहे हैं। क्या अनुकरण कर रहे हैं? जैसे गुरुजी-माताजी हैं, हम वैसे ही बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। कैसे? गुरुजी-माताजी ऐसा बोलते हैं, ऐसा चलते हैं, ऐसा कहते हैं, हम भी ऐसा ही कहेंगे। ये तो ऊपर की भाषा हुई न, अन्तरंग से बनो और अन्तरंग से बनकर गुरुजी का काम करो। बेटे, गुरुजी केवल कोने में नहीं बैठे। उन्होंने कितना विस्तार किया है, इस विराट स्वरूप को आप जरा देखो तो सही। आपने उनका विराट स्वरूप नहीं देखा।

विराट स्वरूप आपने देख लिया होता तो फिर आप राम की तरह से बन गए होते। कृष्ण की माँ ने विराट स्वरूप देखा था तो कृष्ण को समझ लिया था और कौशल्या ने राम का विराट रूप देखा था तो वो समझ गईं कि ये भगवान राम हो सकते हैं। ये भगवान का अवतार हो सकते हैं। तो फिर उनके गुण कैसे हो सकते हैं? उनका गुण ऐसा हो सकता है तो फिर घरवालों का कैसा होना चाहिए?

महान बनिए

बेटे, मैं आपसे निवेदन कर रही थी कि आप जब जुड़ रहे हैं और जुड़ चुके हैं, तो अपने अन्दर उस भावना और श्रद्धा को थोड़ा-सा पनपने दीजिए और इसको ऊँचा उठने दीजिए। अभी तो वो छोटा-सा पौधा है, इसको वृक्ष के रूप में आने दीजिए, ताकि वृक्ष इतना बड़ा हो जाए कि हर व्यक्ति उस पेड़ के तले बैठ करके शान्ति अनुभव कर सके, सन्तोष अनुभव कर सके, प्रेरणा पा सके। आप ऐसे महान बनिए।

आप महान बनेंगे तो हमको सन्तोष भी होगा और प्रसन्नता भी होगी और हम ये भी कहेंगे कि हम अपने पीछे एक ऐसे जनसमूह, एक ऐसे सन्त छोड़ करके जा रहे हैं, जो हजारों और लाखों साल तक यह सन्त-परम्परा चलती हुई चली जाएगी। आपको देख करके लोग चलेंगे? आप नहीं बने, तब नहीं चलेंगे।

आपको बनाने के लिए हम भरसक प्रयास कर रहे हैं और आप न बने तो फिर हम क्या कर सकते हैं? बताइए आपके गले में तो नहीं डाल सकते हैं? आपके हाथों-में-हाथ हम नहीं डाल सकते हैं, आपके पाँव-में-पाँव नहीं लगा सकते हैं। हम तो केवल आपको विचार दे सकते हैं, आपको भावनाएँ दे सकते हैं।

जहाँ तक ऊपर उठाने का प्रश्न है, हम पूरी-पूरी कोशिश करेंगे। करते हैं और करते रहेंगे। आपने पाया भी होगा कि जब-जब आपके ऊपर कोई दिक्कत, कठिनाई, परेशानी आई है, हम उस परेशानी में कितने सहायक हुए हैं? आपका अन्तःकरण बताता होगा, हमें बताने की आवश्यकता नहीं है कि हम बताएँ। हम बताएँगे तो यह अहंकार होगा।

हमारा जो फर्ज और कर्तव्य था, वो हमने पूरा किया। जो हमें करना है, वो तो हम आजीवन करेंगे। हमने यह बीड़ा उठाया है कि हमारे ऊपर कोई जोखिम आती होगी तो हम सहज उसको स्वीकार करेंगे, लेकिन आपको दलदल में से निकालने का पूरा-पूरा प्रयास करेंगे। आपके भाग्य को बदल देंगे, यह कोई गारण्टी नहीं। बिलकुल गारण्टी नहीं है। मनोकामना तो कहाँ किसी की पूरी हुई? किसी की पूरी नहीं हुई। दशरथ की नहीं हुई। सुभद्रा की नहीं हुई, तो आप किसकी मनोकामना पूरी कर देंगे।

नहीं बेटे, हमारे बस की बात तो है नहीं और कहीं चला जा। जिस पर तुझे विश्वास होता हो कि ये सारी मनोकामना पूरी कर देता है तो उसके पास में चला जा, हमारे बूते की तो बात नहीं है। हमारा तो जितना तप का अंश होगा और आपका जो प्रारब्ध का योग होगा, वो आपको मिलता हुआ चला जाएगा और चलता गया भी है। हम तो उसकी ओर आपको संकेत करते हैं कि चाहे आपके दुःख और कष्ट दूर होते होंगे कि नहीं होते होंगे, भगवान जाने। भगवान करे शक्ति हो तो हो ही जाए।

गुरुजी-माताजी की शक्ति

अभी एक लड़का आया था। उसका एक्सीडेंट हो गया और ऐसा भयंकर एक्सीडेंट हुआ कि उसे बचने की उम्मीद नहीं थी। वो कहता है कि उस समय ऐसा मालूम पड़ा कि गुरुजी-माताजी ने मुझे गोद में उठा लिया है और जिस दिन आया तो वो रो गया।

उसने कहा कि माताजी! उस दिन मैंने शक्ति का अनुभव किया कि वास्तव में शक्ति होती है। वह शक्ति मेरे साथ है। इधर से भी ट्रक और उधर से भी ट्रक, उसकी गाड़ी पिचककर बिलकुल चकनाचूर हो गई और वो उसमें बैठा रहा। केवल उसके पैर में फ्रैक्चर आया।

वो अभी लन्दन से लौटा है और मसूरी गया है। बेटे औरों का भी कल्याण हुआ है। मैं नाम तो नहीं लूँगी, जिसकी कि 90% नस ब्लॉक पाई गई और यह कहा गया कि यह तो पाँच वर्ष पहले से नस ब्लॉक है।

उन्हीं के शब्दों में जिन्होंने कहा कि माताजी! मुझे कई बार याद आता रहा कि आपने और गुरुजी ने कहा था कि किसी को साथ में ले जाया कर, अकेला मत चला कर। जब देखो अकेला चलता रहता है। माताजी ऐसा मालूम पड़ा कि मैं इसी के लिए गया था कि जाने गुरुजी की शक्ति क्या है। आकर दोनों पैरों से लिपट गया।

माताजी! आपने कहा क्यों नहीं। अरे बेटा, कहती तो तेरा मनोबल नीचे गिर जाता। अगर यह कहती कि कोई अशुभ घड़ी आने वाली है, इसलिए हमको नहीं जाना चाहिए, हम तेरा मनोबल क्यों तोड़ेंगे।

हम तो कोई मरता भी होगा, तब भी यही कह देंगे कि अभी मरने वाला नहीं है। जानते हैं कि ये मरेगा और मर चुका है, पर हमने कभी किसी की आशा को नहीं तोड़ा। हमेशा आशावादी ही बने रहे। हमेशा जबान से यही कहा। हमने कभी किसी को गिराया नहीं है, जीवन भर उठाया है।

बेटे, पाँचवें दिन वह अपने काम पर चला गया। जिसका ऑपरेशन हुआ हो और जिसके हृदय की नस-नली 90% ब्लॉक हो, आप अनुमान लगाइए कि वो कैसे कामयाब हो गया?

बेटा यह तो हमारा कर्तव्य था, हमने पूरा किया है। भगवान करें सभी का भला हो। प्रारब्धवश किसी को सहयोग नहीं मिल सकता हो तो यह उसका प्रारब्ध हो सकता है, लेकिन हमारे मन में तो सभी के लिए शुभकामनाएँ और सद्भावना है और हर किसी के लिए हम करते रहेंगे।

चाहे हमें जीवन का कोई भी मुआवजा क्यों न चुकाना पड़े और चाहे कोई भी मुसीबत हमको मोल क्यों न लेनी पड़ी हो। कोई शारीरिक रोग अपने ऊपर लेना पड़ा हो तो लेंगे भी। रामकृष्ण परमहंस को अन्तिम समय पर गले का कैंसर हो गया था।

बेटे! एक लड़का आया। उसने मुझसे एक सवाल किया तो मालूम पड़ा कि कोई ऐसे ही बददिमाग है। उसने कहा कि गुरुजी की उम्र कितनी हो गई? मैंने कहा कि हो गई होगी अस्सी साल के करीब। तो उनके कमरे में ताला क्यों लगा रहता है? जरूर कोई बात होगी।

उसने कहा कि तो बीमार होने चाहिए। क्यों बीमार होने चाहिए? क्या मतलब है तेरा? छत्तीस को उठाकर अभी फेंक देंगे। अकेले उनकी वाणी के सामने तो ठहर ही नहीं सकता, शरीर की बात तो पीछे आएगी। पहले तो जबान ही ऐसी है कि तू टिक ही नहीं सकेगा।

बीमार क्यों पड़ेंगे? हम बीमार नहीं हैं और न कभी बीमार हो सकते हैं। कभी नहीं पड़ेंगे, क्यों पड़ेंगे? मान लीजिए 1% हो भी जाएँ तो जिन्होंने लाखों को जबान दी, सो उनका क्या होगा?

बेटे! लाखों को जबान देते हैं और कहते हैं कि बेटा तेरा भला कर देंगे, तो चुकाना नहीं पड़ेगा क्या? उसे या तो बेटा चुकाएगा या माँ-बाप चुकाएँगे। कर्जा तो कर गए तो कोई तो उसे चुकाएगा। हम इसे चुकाने में समर्थ हैं तो हमको खुशी होगी कि हम आपकी कोई सेवा कर पाए।

माँ-पिता का हृदय

बेटे, हम बच्चों की सेवा कर पाए, इससे अच्छा हमारा और सौभाग्य क्या हो सकता है? छोटा बच्चा होता है, पेशाब करता है, टट्टी करता है और माँ पलट-पलट करके खुद गीले में सोती रहती है और बच्चे को सूखे में सुलाती रहती है। बीमार पड़ता है तो सारी-सारी रात जागती है। कौन? माँ जागती है। कौन जागता है? पिता जागता है, नौकरी भी करता है, डॉक्टर को भी लाता है, पेट पर पट्टी बाँधता है।

घर में खाने को नहीं है, लेकिन बच्चे के लिए चाहे कर्जा लाना पड़े, चाहे जो भी लाना पड़े, लेकिन बच्चे को हर हालत में वो डॉक्टर के पास ले जाता है, दवा-दारू कराता है। उसके भविष्य की चिन्ता करता रहता है कि मेरा बच्चा कैसे महान बने। कैसे इसको ऊँचा उठाऊँ, कैसे इसको पढ़ाऊँ-लिखाऊँ। कैसे इसको रोजी-रोटी दिलाऊँ, जाने क्या-क्या ख्वाब माँ-बाप देखते रहते हैं। बेटे! बिलकुल हमारी दशा भी वही है।

सच मानना बिलकुल हमारी दशा वही है। आपके ऊपर जब कोई दुःख-कष्ट आता है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि यह वज्र मानो हमारे ऊपर टूटा है। इस वज्र को कैसे हल करें, किस तरीके से हल करें? आप नहीं जानते कि जब हम हल नहीं कर पाते तो हमारे अन्तःकरण में आपके लिए जो पीड़ा होती है, उसको हम ही जानते हैं।

माताजी! फिर पीड़ा से आप क्या करते हैं? रोते रहते हैं? नहीं बेटे, रोते तो आप होंगे, हम रोते तो नहीं हैं, पर हम उसी क्षण तिलमिला जाते हैं और पीड़ित के पास जाते हैं। उसके पास जाते ही यह कहते हैं कि बेटी तुझे परेशान होने की जरूरत नहीं। परेशान मत होना। तेरे साथ तेरी माँ है, तेरा पिता है। बेटे! परेशान मत होना, जरा भी हैरान मत होना, हम तुम्हारे साथ हैं न। हम तुम्हारे सुख में ही साथ नहीं हैं, लेकिन आपके दुःख में भी हम जरूर आपको मनोबल देंगे, आपको सहारा देंगे, आपको हिम्मत देंगे, आपको बल देंगे, आपको प्रेरणा देंगे, ताकि उस संकट की घड़ी को आप झेल सकें।

आप तिलमिलाकर के पागल हो जाएँगे, मर जाएँगे, न मालूम क्या-क्या हो जाएगा? पर हम आपको डगमगाने नहीं देंगे। कोई भी परिस्थिति क्यों न हो, चाहे आपके इनकम टैक्स की हो, चाहे सेल्स टैक्स की हो, चाहे आपकी पारिवारिक हो, चाहे जो भी हो, हर हालत में हम आपको बल और शक्ति देते हुए चले जाएँगे। अभी भी दे रहे हैं और आगे भी हम नहीं भी रहेंगे, तब भी आप आना यहाँ।

अखण्ड दीप में गुरुसत्ता

आपको आमंत्रण है कि जो आपने पल्ला पकड़ा है तो इसको छोड़ना मत। आप फिर यहाँ आना और वही प्रेरणा, वही शान्ति और सन्तोष, वही शक्ति और भक्ति आपको मिलती हुई चली जाएगी, जो इस समय आपको मिल रही है। आप शान्तिकुञ्ज में आ करके एक-दो मिनट बैठना तो सही, आप अखण्ड दीपक को प्रणाम तो करना और उसमें देखना कि गुरुजी-माताजी दिखाई पड़ते हैं कि नहीं दिखाई पड़ते।

शान्तिकुञ्ज में आना और देखना, हर जगह आपको गुरुजी-माताजी दिखाई पड़ेंगे। यदि आपका दृष्टिकोण सही है तो और आपका दृष्टिकोण गलत है तो हम बैठे हैं तब भी आपको नहीं दिखाई पड़ेंगे, क्योंकि आपने अपने हृदय को नहीं खोला।

आँख को खोला है और आपने शरीर देखा है, लेकिन आपने उन सिद्धान्तों को, भावनाओं को अंतरंग में झाँक करके नहीं देखा है। जैसे कि काकभुशुण्डी ने भगवान राम के पेट में जाकर के देखा था।

उतना साहस आप कहाँ जुटा पाए, उतना साहस आप नहीं जुटा पाए। इतना साहस आप जिस दिन जुटा लेंगे तो फिर आप अन्तः करण में देख पाएँगे। अंतरंग को जब आप देख लेंगे तो फिर आप निहाल हो जाएँगे।

बेटे, आप निहाल हो जाएँगे जैसे कि शक्ति को पाकर के हम निहाल हुए, आप भी उस शक्ति को पाकर के निहाल हो जाएँगे, जो अनवरत रूप से बरस रही है, लेकिन हम कैसे भाग्यहीन हैं, जो उसको नहीं ले पा रहे हैं, उसको सँभाल नहीं पा रहे हैं। उसको हम आँचल भरकर के नहीं ले पा रहे हैं।

हम झोली नहीं फैला रहे हैं और न हम अपने हृदय के कपाट को खोल रहे हैं। जरा खोलें तो सही और फिर देखिए गायत्री माता आती हैं कि नहीं आतीं।

अरे, माताजी! कल आई थीं, हमने सपने में देखा था गायत्री माता को। कैसा देखा? हंस पर सवार थी, मुकुट पहने थी और कुछ कह रही थी, कुछ हँस रही थी। अच्छा बेटा, इतनी दूर से गायत्री माता आई तो फिर तेरे जीवन में कोई परिवर्तन हुआ कि नहीं? सो तो मेरे जीवन में कुछ नहीं हुआ। तो फिर कहाँ से स्वप्न में गायत्री माता आई। स्वप्न में तो जाने क्या-क्या देखते हैं, सपने में पानी में डूबना देखते हैं। ब्याह-शादी देखते हैं और जाने क्या-क्या देखते हैं। कहीं रेल में चलने, हवाई जहाज में चलने के सपने देखते हैं।

संकल्प के पर्व पर संकल्प लें

बेटे, गायत्री माता की अनुकम्पा तेरे ऊपर बरसती भी रही तो भी तूने नहीं देखा। तू अनभिज्ञ ही बना रहा। उस अनुकम्पा को ग्रहण करता। जैसे गाँधी जी ने हरिश्चन्द्र नाटक देखा था और नाटक देख करके अपने जीवन का परिवर्तन कर डाला। हरिश्चन्द्र अपने गुरु के लिए बिक गया था। आप तो अन्त तक स्वप्न देखते रहते हैं, नींद आती नहीं है, पेट को ज्यादा भर लेते हैं, स्वप्न नहीं आएँगे तो और क्या आएगा। वही स्वप्न नाना प्रकार का रूप ले लेते हैं। हम नाना प्रकार का रूप न दें और उसको सही स्वरूप दे दें तो फिर हम समझेंगे कि वास्तविकता को हमने पा लिया है।

मेरा आपसे यही निवेदन है कि आज यह संकल्प का पर्व है और आज के ही दिन माँ गायत्री का अवतरण हुआ, माँ गंगा का अवतरण हुआ। माँ गंगा को लाने में भगीरथ ने तपस्या की और युग के भगीरथ ने ज्ञान की गंगा लाने के लिए संकल्प किया और माँ गायत्री को लाने में सफल हो गए और जनमानस के हृदय में उन्होंने उतार दिया। आप भी संकल्प कीजिए कि जो बचा हुआ शेष कार्य है, उसको हम पूरा करेंगे। जैसे कि मैंने अभी प्रथम बार कहा था, उसकी पुनरावृत्ति तो होती जरूर चल रही है, लेकिन जो मुँह में शब्द आते हैं, वो रुकते नहीं हैं, वो बार-बार ही कहने चाहिए, बार-बार ही पाठ कराना चाहिए।

युधिष्ठिर से ‘सत्यम् वद’ शब्द याद करने के लिए कहा गया। अगले दिन कहा कि तुमको क्या पाठ याद हो गया? कहा नहीं गुरुजी! अभी नहीं हुआ और सब लोग कहते हुए चले गए कि हमको याद हो गया, सुन लीजिए और सब कहते हुए चले गए।

गुरुजी ने युधिष्ठिर से कहा कि क्या बात है तुम क्यों नहीं कहते हो? तुम तो इतने योग्य हो। उन्होंने कहा कि गुरुदेव! ये जबान से कह रहे हैं, मैंने अभी धारण नहीं किया है। जिस दिन मैं धारण कर लूँगा, उस दिन मैं कह दूँगा और जिस दिन उन्होंने धारण कर लिया, उसी दिन उन्होंने सुना दिया अर्थात हमको धारण करना चाहिए और संकल्प करना चाहिए कि हम भी इस योग्य बनें कि माँ गायत्री की अनुकम्पा हमारे ऊपर बरसती हुई चली जाए। फिर आपके सामने तो साक्षात् गुरुजी बैठे हैं। गायत्री माता की इतनी कृपा आपके ऊपर बरसती रही है और हर परिस्थितियों में माँ सहारा देती हुई चली गई हैं और अपने कलेजे से लगाती ही चली गई हैं और कहा है कि बेटे मैं तेरे साथ हूँ। तूने तो मेरा उद्धार किया ही है, पर मैं भी तेरा उद्धार करके रहूँगी और सही मानना गायत्री माता का उद्धार हुआ, गायत्री माता के बेटे का उद्धार हुआ। दोनों का उद्धार हो गया और साथ-साथ में आपका भी उद्धार हो गया। आपका भी होगा, चूँकि एक-से-एक जुड़ते हुए चले गए न। बेटे, आप का भी उद्धार हो गया।

भगवान करे और भी जो थोड़ा-बहुत रह गया, वो भी आपका उद्धार हो जाए। अब मैं यहीं पर अपनी बात समाप्त करती हूँ। आज का यह पर्व, गायत्री माता का पर्व, शक्ति का पर्व है। उस शक्ति से हम प्रार्थना करते हैं कि हे माँ गायत्री! आपकी शक्ति सारे-के-सारे जनमानस में फैलती हुई चली जाए और ये शक्ति आपको भी मिले, आपके परिवार को मिले, आपसे मिलकर के सारी जनता को मिले, समाज को मिले, राष्ट्र को मिले और सारे विश्व को शक्ति मिले। जिस शक्ति की प्यास में हम तड़प रहे हैं, जिस शक्ति के लिए जनमानस तिलमिला रहा है। उस शक्ति को पा करके धन्य हो जाएँ। खुशहाल हो जाएँ, प्रसन्न हो जाएँ, सन्तुष्ट हो जाएँ। बस, इतनी ही बात कहनी थी। भगवान आपका कल्याण करें।

॥ ॐ शान्तिः ॥