परम पूज्य गुरुदेव का ‘अन्तिम सन्देश’ ‘‘अस्सी वर्ष जी गई लम्बी सोद्देश्य शरीर यात्रा पूरी हुई। इस अवधि में परमात्मा को हर पल अपने हृदय और अन्तःकरण में प्रतिष्ठित मानकर एक-एक क्षण का पूरा उपयोग किया है। शरीर अब विद्रोह कर रहा है। यों उसे कुछ दिन और घसीटा भी जा सकता हैं, पर जो कार्य परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता ने सौंपे, वे सूक्ष्म और कारण शरीर से ही सम्पन्न हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में कृशकाय शरीर से मोह का कोई औचित्य भी नहीं है।’’ ‘ज्योति बुझ गई’ यह भी नहीं समझा जाना चाहिए। अब तक के जीवन में जितना कार्य इस स्थूल शरीर ने किया है, उससे सौ गुना सूक्ष्म अन्तःकरण से सम्भव हुआ है। आगे का लक्ष्य विराट है। संसार भर के छह अरब मनुष्यों की अन्तश्चेतना को प्रभावित और प्रेरित करने, उनमें आध्यात्मिक प्रकाश और ब्रह्मवर्चस जगाने का कार्य पराशक्ति से ही सम्भव है। जीवन की अन्तिम घड़ियाँ उसी उपक्रम में बीती हैं। इसके उपरान्त वे सभी परिजन, जिन्हें हमने ममत्व के सूत्रों से बाँधकर परिवार के रूप में विस्तृत रूप दे दिया है, सम्भवतः स्थूल नेत्रों से हमारी काया को नहीं देख पाएँगे, पर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि इस शताब्दी के अन्त तक, जब तक सूक्ष्मशरीर कारण के स्तर तक न पहुँच जाए, हम शान्तिकुञ्ज परिसर व प्रत्येक परिजन के अन्तःकरण में विद्यमान रहकर अपने बालकों में नवजीवन और उत्साह भरते रहेंगे। उनकी समस्या का समाधान उसी प्रकार निकलता रहेगा, जैसा कि हमारी उपस्थिति में उन्हें उपलब्ध होता। हमारे आपसी सम्बन्ध अब और भी प्रगाढ़ हो जाएँगे, क्योंकि हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े थे। हमें एक क्षण के लिए भी भुला पाना आत्मीय परिजनों के लिए कठिन हो जाएगा। ब्रह्मकमल के रूप में हम तो खिल चुके, किन्तु उसकी शोभा और सुगन्धि के विस्तार हेतु ऐसे अगणित ब्रहाबीज देवमानव उत्पन्न किये जा रहे हैं, जो खिलकर समूचे संस्कृति सरोवर को सौन्दर्य-सुवास से भर सकें, मानवता को निहाल कर सकें । ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं का उत्पादन, प्रशिक्षण एवं युग-परिवर्तन के महान कार्य में उनका नियोजन बड़ा कार्य है। यह कार्य हमारे उत्तराधिकारियों को करना है। शक्ति हमारी काम करेगी तथा प्रचण्ड शक्तिप्रवाह अगणित देवात्माओं को इस मिशन से अगले दिनों जोड़ेगा। उन्हें संरक्षण, स्नेह देने, खरादने, सँवारने का कार्य माताजी सम्पन्न करेंगी। हम सतयुग की वापसी के सरंजाम में जुट जाएँगे। जो भी संकल्पनाएँ नवयुग के सम्बन्ध में हमने की थीं, वे साकार होकर रहेंगी। इसी निमित्त कायपिंजर का सीमित परिसर छोड़कर हम विराट् घनीभूत प्राण ऊर्जा के रूप में विस्तृत होने जा रहे हैं। देव समुदाय के सभी परिजनों को मेरे कोटि-कोटि आशीर्वाद, आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होने हेतु अगणित शुभकामनाएँ। परम वन्दनीया माताजी का ‘अन्तिम सन्देश’ जिन चरणों में अपने आप को समर्पित किया, उनके बिना जीवन का एक-एक क्षण पीड़ा के पहाड़ की तरह बीत रहा है। जिस दिन उनके पास आई, उस दिन का पहला पाठ था—पीड़ित मानवता की सेवा और देव संस्कृति का पुनरोदय, सो अपने आप को उसी में घुला दिया। यद्यपि यह एक असह्य वेदना थी, तथापि महाप्रयाण से पूर्व परमपूज्य गुरुदेव की आज्ञा थी कि अपने उन बालकों की अँगुली पकड़कर उन्हें मिशन की सेवा के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ा दूँ, जिन्हें अगले दिनों उत्तरदायित्व सँभालने हैं। पिछले चार वर्षों में मिशन जिस तरह आगे बढ़ा, वह सबके सम्मुख है, जो मैं देख रही हूँ। आगे का भविष्य तो इतना उज्ज्वल है, जिसे कल्पनातीत और चमत्कार कहा जा सकता है। उसके लिए जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता है, हमारे बालक अब उसमें पूर्णतया प्रशिक्षित हो गए हैं। शरीर यात्रा अब कठिन हो रही है। उनके जाने के पश्चात से आज तक एक क्षण भी ऐसा नहीं बीता, जब वे आँखों से ओझल हुए हों। घनीभूत पीड़ा अब आँसू रोक नहीं पा रही, सो मुझे उन विराट् तक पहुँचना अनिवार्य हो गया है। यह न समझें, हम स्वजनों से दूर हो जायेंगे। परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म एवं कारण सत्ता में विलीन होकर हम अपने आत्मीय कुटुम्बियों को अधिक प्यार बाँटेंगे, उनकी सुख-सुविधाओं में अधिक सहायक होंगे। हमारा कार्य अब सारथी का होगा। दुष्प्रवृत्तियों से महाभारत का मोर्चा अब पूरी तरह हमारे कर्त्तव्यनिष्ठ बालक सँभालेंगे। सभी क्रियाकलाप न केवल पूर्ववत सम्पन्न होंगे, वरन् विश्व के पाँच अरब लोगों के चिन्तन, जीवन, व्यवहार, दृष्टिकोण में परिवर्तन और मानवीय सम्वेदना की रक्षा के लिए और अधिक तत्पर होकर कार्य करेंगे। हम तब तक रुकें नहीं, जब तक धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अभ्युदय स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने लगे।