ध्यानयोग का व्यावहारिक क्रियापक्ष (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
कौन सी? ‘पादसेवनम् पंखाझलनम्’—पादसेवन और पंखा झलने को ही नवधा कहता है। जो बातें भक्ति हैं उनसे तो हजारों मील दूर भागते रहते हैं और स्वाँग करते रहते हैं; खेल-खिलौने बनाते रहते हैं; दण्ड-कमण्डलु पेलते हैं और भगवान् को भी धोखा देते हैं और अपने को भी धोखा देते और कहते हैं कि नवधा भक्ति करते हैं। बेटे! इसे नवधा भक्ति कहते हैं। मित्रो! क्या करना पड़ेगा, भक्तियोग के उस वास्तविक स्वरूप को समझना पड़ेगा, जिसके लिए हमने आपको बताया था कि आप प्रकाश का ध्यान कीजिए
कौन सी? ‘पादसेवनम् पंखाझलनम्’—पादसेवन और पंखा झलने को ही नवधा कहता है। जो बातें भक्ति हैं उनसे तो हजारों मील दूर भागते रहते हैं और स्वाँग करते रहते हैं; खेल-खिलौने बनाते रहते हैं; दण्ड-कमण्डलु पेलते हैं और भगवान् को भी धोखा देते हैं और अपने को भी धोखा देते और कहते हैं कि नवधा भक्ति करते हैं। बेटे! इसे नवधा भक्ति कहते हैं
उपासना की सफलता साधना पर निर्भर (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
इनसे खेलिये। ये खिलौने के लिए हैं कि आपको पालन करना पड़ता है? पालन नहीं करना पड़ता। आप थके हुए आते हैं, चाबीदार खिलौनों से जैसे बच्चे खेलते हैं, आप इन बच्चों से वैसे ही खेलिये। ये आपके लिए क्या उपद्रव पैदा कर सकते हैं?
ये खिलौने के लिए हैं कि आपको पालन करना पड़ता है? पालन नहीं करना पड़ता। आप थके हुए आते हैं, चाबीदार खिलौनों से जैसे बच्चे खेलते हैं, आप इन बच्चों से वैसे ही खेलिये। ये आपके लिए क्या उपद्रव पैदा कर सकते हैं?। हरेक को स्वावलम्बी बनाइये, आप उन्हें संस्कारवान् बनाइये
उसमें भी यह लिखा हुआ है कि आधा अनाज से भरो, थोड़ा हवा के लिए छोड़ो और थोड़ा पानी के लिए छोड़ो, तो मुश्किल से दो मुट्ठी का अनाज आता है। आदमी खुराक कितनी है! जरा-सी है और आदमी का खर्चा? खर्चा भी कम और कुटुम्ब का? कुटुम्ब पालने में हमको बाहरी शक्ति लगानी पड़ती है? कुटुम्ब तो खिलौने हैं। बच्चे हैं ये आपके। इनसे खेलिये
बहुदेववाद को समझें, भ्रम-जंजाल में न उलझें (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
बिना लक्ष्य के नहीं हैं, ये सब चीजें। आप ऐसा समझते हों कि जिसके जी में आया, वो लिखकर रख गया भागवत् और जिसके जी में आया, वो लिख गया महाभारत और जिसके जी में आया, वो मंत्र हनुमानजी का बन गया और जिसके जी में आया इस तरह के खेल-खिलौने हरेक ने नहीं बनाये। इनके पीछे एक लक्ष्य है। मित्रो! लक्ष्य क्या है? लक्ष्य सिर्फ एक है
आकृति? आकृति का नहीं। आकृति तो हमने ऐसे ही खिलौने के रूप में बना दी है और अलंकार के रूप में बना दी है। काला रंग उसका है, जिसका समाज में काला मुँह हो गया। हमको शीशे में अपना मुँह देखना चाहिए कि हमारा मुँह काला तो नहीं? हम कलंकी तो नहीं हैं? कलंकी हैं, तो हम राक्षस हैं और हमारे दाँत बड़े-बड़े हैं
विधा को समझें, विधि में न उलझें (गायत्री परिवार - Gayatri Pariwar)
क्यों साहब! प्रतीक मीरा को नहीं मिलता, पत्थर न मिलता तो? तो मुश्किल थी। एकलव्य को मिट्टी का खिलौना न मिलता तो? तो बेटे मुश्किल थी; क्योंकि भावना का सम्वर्द्धन और श्रद्धा का एकत्रीकरण किसी प्रतीक की अपेक्षा करता है। प्रतीक नहीं होगा, तो मुश्किल पड़ जाएगी। नहीं, ऐसे ही में कर लेंगे
ये है हमारा गुरु, इन्होंने हमें सिखा दी। मिट्टी का खिलौना? हाँ, मिट्टी के खिलौने को आप समझते क्या हैं! क्यों? साहब! मिट्टी का खिलौना हम भी बना लें, चाहे किसी का भी बना लें, आपके लिए वह कतई कारगर नहीं हो सकता। क्यों? कैसे? आपका क्यों कारगर हो गया? पाण्डव पूछने लगे एकलव्य से। उसने कहा—मिट्टी के साथ में हमारी जुड़ गई है श्रद्धा
उसने कहा—मिट्टी के साथ में हमारी जुड़ गई है श्रद्धा। सुनते हो कि नहीं श्रद्धा? श्रद्धा भी सुनी है कि नहीं? कभी श्रद्धा भी देखी है? श्रद्धा को भी जानते हो? श्रद्धा को भी पूछते हो? श्रद्धा का भी कुछ मालूम है?
खिलौने लिए फिरते हो। बेवकूफो! केवल खिलौने से कोई बात नहीं बनेगी। शालिग्राम लाए हैं, फलानी चीज लाए हैं, गणेशजी लाए हैं, रुद्राक्ष की माला लाए हैं
रामकृष्ण परमहंस के पास भी एक खिलौना था। खिलौना? हाँ, खिलौना। खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में। क्या रखा हुआ है? खिलौना और देवी! देवी नहीं है, खिलौना है
उसने फिर एक नया तरीका निकाला। क्या तरीका निकाला कि मिट्टी का खिलौना बना लिया। मिट्टी कैसी होती है? बेजान होती है, जान नहीं होती कुछ भी। अकल-वक्ल भी नहीं कुछ
आपकी यहाँ से गाड़ी चले तो आगे बढ़े और आपने यही बनाकर रखा हुआ कि ये देवी का खिलौना, ये चामुण्डा का खिलौना, ये माता का खिलौना, ये फलाने का खिलौना है। इन खिलौनों में कमाल देखा है, तो आपने प्रारम्भिक भूल कर दी। प्रारम्भिक उन्नति नहीं हुई। ये मानिये कि ये शक्ति जगाने वाली, सामर्थ्य जगाने वाली, ये भगवान से आने वाली है
आप समझते क्यों नहीं है? मीरा ने यही कर लिया और किस-किस ने किया? बेटे! अब कहाँ तक नाम गिनाऊँगा आपको। किस-किस के नाम गिनाऊँगा?
रामकृष्ण परमहंस के पास भी एक खिलौना था। खिलौना? हाँ, खिलौना। खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में
किस-किस के नाम गिनाऊँगा?
रामकृष्ण परमहंस के पास भी एक खिलौना था। खिलौना? हाँ, खिलौना। खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में। क्या रखा हुआ है? खिलौना और देवी! देवी नहीं है, खिलौना है
रामकृष्ण परमहंस के पास भी एक खिलौना था। खिलौना? हाँ, खिलौना। खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में
यही हो गया। द्रोणाचार्य का खिलौना मिट्टी का उसने बनाया और उसके माध्यम से सीखना शुरू किया और उस खिलौने ने कमाल कर दिया, कमाल! क्या कर दिया? इतनी जबरदस्त शिक्षा दी कि पाण्डवों के कुत्ते का जब उसने मुँह बन्द कर दिया, तो पाण्डवों ने कहा—ऐसी बाण-विद्या तो पृथ्वी के, दुनिया के इतिहास में अभी तक नहीं देखी। सामने से तीर चलाए जाते हैं, पार निकल जाते हैं, ये तो होता रहा है, तिकोने तीर नीचे से चलते हों, सिर्फ होंठ को सीते हों, गले में भी नहीं जाते हों, कहीं इधर-उधर नहीं लगते हों, सिर्फ मुँह को बन्द कर दें, कमाल है! ऐसी बाण-विद्या किसी ने भी नहीं सीखी? कुत्ते का नुकसान तो भूल गए ये पता लगाने लग गए कि ऐसा विद्वान कौन आ गया है? तलाश करने लग गए तो मालूम पड़ा—एकलव्य नाम का एक लड़का, ये बाण-विद्या सीख रहा था। हम भी इससे सीखेंगे
सुनते हो कि नहीं श्रद्धा? श्रद्धा भी सुनी है कि नहीं? कभी श्रद्धा भी देखी है? श्रद्धा को भी जानते हो? श्रद्धा को भी पूछते हो? श्रद्धा का भी कुछ मालूम है?
खिलौने लिए फिरते हो। बेवकूफो! केवल खिलौने से कोई बात नहीं बनेगी। शालिग्राम लाए हैं, फलानी चीज लाए हैं, गणेशजी लाए हैं, रुद्राक्ष की माला लाए हैं। इन पदार्थों को लिए फिरते हों; वस्तुओं को लिए फिरते हो
हम भी इससे सीखेंगे। उससे पूछा—भाई साहब! ये कुत्ता मारा गया, मर जाने दीजिए, कोई बात नहीं, कुत्ता नया पाल लेंगे; लेकिन एक बात बताइये—आपने ये बाण विद्या किससे सीखी है? उसी से हम भी सीखने के इच्छुक हैं, सो उसने मिट्टी के खिलौने की तरफ इशारा किया। ये है हमारा गुरु, इन्होंने हमें सिखा दी। मिट्टी का खिलौना? हाँ, मिट्टी के खिलौने को आप समझते क्या हैं! क्यों? साहब! मिट्टी का खिलौना हम भी बना लें, चाहे किसी का भी बना लें, आपके लिए वह कतई कारगर नहीं हो सकता
प्रतीकों की जरूरत है? प्रतीकों की भी जरूरत है; लेकिन प्रतीक मूल्यवान तब हो सकते हैं; प्रतीक सामर्थ्यवान तब हो सकते हैं, जब साधक की श्रद्धा का समन्वय हो जाए। अध्यात्म का प्राण है—श्रद्धा! श्रद्धा!! अध्यात्म के कलेवर हैं—कर्मकाण्ड, प्रतीक, खिलौने, मूर्तियाँ—ये सब प्रतीक हैं। कर्मकाण्ड—यह प्रतीक हैं। कर्मकाण्ड प्रतीक हैं, जिसको आप करते रहते हैं और जिसके बारे में न जाने क्या-से कल्पना लगाए बैठे हैं कि ये कर्मकाण्ड करेंगे, तो ये मिल जाएगा और ये कर्मकाण्ड करेंगे, तो वो मिल जाएगा, ये प्रतीक ले आएँगे, तो ये मिल जाएगा
खिलौना? हाँ, खिलौना। खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में। क्या रखा हुआ है? खिलौना और देवी! देवी नहीं है, खिलौना है। अभी यहीं पड़ी हुई है वह पत्थर की मूर्ति एक कोने में—दक्षिणेश्वर के मन्दिर में
खिलौना कहाँ रखा हुआ है? दक्षिणेश्वर के मन्दिर में। क्या रखा हुआ है? खिलौना और देवी! देवी नहीं है, खिलौना है। अभी यहीं पड़ी हुई है वह पत्थर की मूर्ति एक कोने में—दक्षिणेश्वर के मन्दिर में। क्या हुआ काली के भीतर? काली के भीतर प्राण फूँक दिया
खिलौने लिए फिरते हो। बेवकूफो! केवल खिलौने से कोई बात नहीं बनेगी। शालिग्राम लाए हैं, फलानी चीज लाए हैं, गणेशजी लाए हैं, रुद्राक्ष की माला लाए हैं
प्रत्येक कर्मकाण्ड को एक शिक्षण बना दिया था। शिक्षण, चीनी भाषा में आपको मालूम नहीं? चीनी भाषा में जो अक्षर है, खिलौने के रूप में हैं। जैसे चिड़िया है—‘च’, तो ‘च’ को चिड़िया के रूप में व्यक्त करेंगे। जैसे ‘क’ माने कबूतर हमारे यहाँ बनता है, तो ‘च’ माने चिड़िया अगर बनेगी, तो चीनी भाषा में चिड़िया की शक्ल बना देंगे, तो वो ‘च’ हो जाएगा
खिलौने लिए फिरते हो। बेवकूफो! केवल खिलौने से कोई बात नहीं बनेगी। शालिग्राम लाए हैं, फलानी चीज लाए हैं, गणेशजी लाए हैं, रुद्राक्ष की माला लाए हैं। इन पदार्थों को लिए फिरते हों; वस्तुओं को लिए फिरते हो
भगवान सिद्धान्तों का नाम है और भगवान को हम उच्चस्तरीय सिद्धान्तों के प्रतीक और प्रतिमा मान लेते हैं। आपकी यहाँ से गाड़ी चले तो आगे बढ़े और आपने यही बनाकर रखा हुआ कि ये देवी का खिलौना, ये चामुण्डा का खिलौना, ये माता का खिलौना, ये फलाने का खिलौना है। इन खिलौनों में कमाल देखा है, तो आपने प्रारम्भिक भूल कर दी। प्रारम्भिक उन्नति नहीं हुई